जब भी कोई रिश्ता दोस्ती और प्यार के दायरे के बीच आकर खड़ा हो जाता है, तो उसकी किस्मत में टूटना ही लिखा होता है। ऐसा क्यों होता है? सवाल ये भी है कि आखिर कोई रिश्ता दोस्ती और प्यार के बीच में आकर रुक ही क्यों जाता है? दोस्ती तक ही सीमित क्यों नहीं रहता या फिर प्यार में ही तब्दील क्यों नहीं हो जाता?
अक्सर जिंदगी की उबड़-खाबड़ सड़क पर चलते हुए जब मन लहुलुहान हो जाता है, तो उसे सहारे की जरूरत होती है। ऐसे में यदि कोई जाने-अंजाने आगे बढ़कर हाथ थामें या सहारा दे दे, तो उससे दोस्ती होना लाजिमी है। देर सवेर ऐसे ही रिश्ते जब थोड़ा और सहारा एक-दूजे में तलाशने लगते हैं, तो वो रिश्ता दोस्ती की सीमा लांघकर, लगाव के दायरे में पहुंच जाता है। बहुत मुमकिन है कि ऐसे रिश्ते प्यार में तब्दील हो जाएं, लेकिन हर बार ऐसा हो नहीं पाता। क्योंकि ये रिश्ते किसी और रिश्ते में बंधे हुए भी हो सकते हैं। फिर अंजाम क्या होता है?
वही जो फिर बहुत तकलीफ देता है। अलगाव। और शायद यही सही भी है, क्योंकि इन रिश्तों का कोई नाम नहीं होता, कोई पहचान नहीं होती और कोई मुस्तकबिल भी नहीं होता। कई लोग इन्हें दोस्ती का जामा ओढ़ाए सालों निभा लेते हैं, लेकिन ज्यादातर दोनों में से कोई एक, इस रिश्ते को तोड़ देता है। वजह? वजह होता है डर? डर उस रिश्ते के अंजाम का। एक बात तो तय है कि इस रिश्ते के टूटने की एक और वजह ये होती है कि दोनों में से किसी एक को दूसरे से प्यार हो जाता है और फिर बढ़ जाती हैं उम्मीदें। ऐसी उम्मीदें जिनका टूटना निश्चित है। और जब ये उम्मीदें टूटती हैं, तो दिल में किरचों की तरह धंस जाती हैं, जिनसे न खून रिसता है और ना ही जख्म दिखाई देता है। बस कुछ अंदर फंसा रहता है, दुखता हुआ।
ऐसे दुखते किरचों को निकालने के लिए ऐसे रिश्तों का टूट जाना ही बेहतर है शायद। काश, दोस्ती और प्यार के बीच पलने वाले इस रिश्ते का भी कोई नाम, कोई वजूद होता। तब शायद टूटना ही इसकी नियति न होती....
अक्सर जिंदगी की उबड़-खाबड़ सड़क पर चलते हुए जब मन लहुलुहान हो जाता है, तो उसे सहारे की जरूरत होती है। ऐसे में यदि कोई जाने-अंजाने आगे बढ़कर हाथ थामें या सहारा दे दे, तो उससे दोस्ती होना लाजिमी है। देर सवेर ऐसे ही रिश्ते जब थोड़ा और सहारा एक-दूजे में तलाशने लगते हैं, तो वो रिश्ता दोस्ती की सीमा लांघकर, लगाव के दायरे में पहुंच जाता है। बहुत मुमकिन है कि ऐसे रिश्ते प्यार में तब्दील हो जाएं, लेकिन हर बार ऐसा हो नहीं पाता। क्योंकि ये रिश्ते किसी और रिश्ते में बंधे हुए भी हो सकते हैं। फिर अंजाम क्या होता है?
वही जो फिर बहुत तकलीफ देता है। अलगाव। और शायद यही सही भी है, क्योंकि इन रिश्तों का कोई नाम नहीं होता, कोई पहचान नहीं होती और कोई मुस्तकबिल भी नहीं होता। कई लोग इन्हें दोस्ती का जामा ओढ़ाए सालों निभा लेते हैं, लेकिन ज्यादातर दोनों में से कोई एक, इस रिश्ते को तोड़ देता है। वजह? वजह होता है डर? डर उस रिश्ते के अंजाम का। एक बात तो तय है कि इस रिश्ते के टूटने की एक और वजह ये होती है कि दोनों में से किसी एक को दूसरे से प्यार हो जाता है और फिर बढ़ जाती हैं उम्मीदें। ऐसी उम्मीदें जिनका टूटना निश्चित है। और जब ये उम्मीदें टूटती हैं, तो दिल में किरचों की तरह धंस जाती हैं, जिनसे न खून रिसता है और ना ही जख्म दिखाई देता है। बस कुछ अंदर फंसा रहता है, दुखता हुआ।
ऐसे दुखते किरचों को निकालने के लिए ऐसे रिश्तों का टूट जाना ही बेहतर है शायद। काश, दोस्ती और प्यार के बीच पलने वाले इस रिश्ते का भी कोई नाम, कोई वजूद होता। तब शायद टूटना ही इसकी नियति न होती....
क्या गहरी सोच है !!
ReplyDeleteतुमने बहुत खूबसूरती से इस अनाम रिश्ता को, जो दोस्ती और प्यार के बीच है वर्णित किया है |
और यह बहुत अच्छा हिन्दी में लिखा है |
ese to sirf bahi samjh sakta h jisne dosti ki ho or fir pyar kyoki agar ap achhe dost nhi h to pyar ho hi nhi sakta. miss u
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