शहर: कानपुर
प्रांत: उत्तरप्रदेश
खासियत: शौकीनों का शहर
कानपुर से यूं तो मेरा वास्ता कई साल पहले से था। मौसा जी के स्थानांतरण के बाद मौसी लोग वहां काफी साल रहे। उनके पास ब्रेक जर्नी के दौरान जाना होता था। फिर एक मौसी की लड़की की शादी भी कानपुर में हुई। उस वक्त भी वहां जाना हुआ। सो कानपुर की जमीं पर कदम तो कई बार पड़े, लेकिन उस शहर को करीब से जानने का मौका एक भी बार नहीं मिल पाया। पर पिछले दिनों दशहरे का दिन कानपुर में बिताने को मिला और मेरी उस शहर से दोस्ती हो गई।
दुर्गा पूजा के लिए लखनऊ तक पहुंची थी। सो रिश्तेदारों से मिलने कानपुर जाना भी तय हुआ। दशहरे वाले दिन अल सुबह मैं और मां निकल पड़े कानपुर के लिए। सुबह की ठंडी हवाएं जैसे हमारे स्वागत को आतुर थीं। वहां जाकर पहली बार पता चला कि कानपुर सिर्फ खाने-पीने के लिए ही नहीं बल्कि और भी कई चीजों के लिए मशहूर है, जिनमें से सबसे खास रही हमारी बिठुर यात्रा।
दोपहर को हम लोग खाना खाने के बाद निकल पड़े कानपुर दर्शन के लिए। कुछ वक्त बाद ऐसा लगा जैसे शहर की भीड़-भाड़ से दूर गांव के शुद्ध वातावरण में कदम रख दिया हो। पता चला बिठुर आ गया है। सबसे पहले उडिय़ा समुदाय द्वारा बनवाया गया श्री जगन्नाथ जी का मंदिर देखा। मंदिर बेहद ही खूबसूरत और पूरी श्रद्धा से बनवाया गया है। तब जाकर महसूस हुआ कि अगर भक्त चाहे तो भगवान को वहीं बुला सकता है, जहां वह खुद है। यहां से आगे बढ़े, तो अगला पड़ाव रहा सुधांशु जी महाराज द्वारा आश्रम जिसे सिद्धधाम आश्रम के नाम से भी जाना जाता है। यहां का माहौल ही कुछ अलग था। इस जगह को दर्शनीय, वंदनीय और रमणीय होने की संज्ञा एक साथ दी जा सकती है। भीतर सबसे पहले दिखा विशाल मंदिर जहां, राधा-कृष्ण को मुख्य स्थान दिया गया है। मंदिर के बाईं ओर एक पहाड़ की आकृति दिखाई दी, जिसपर शिव-पार्वती अपने पुत्र गणेश सहित विराजमान थे। यह दृश्य हिमालय का है। इस पहाड़ के अंदर से भीतर जाने का रास्ता था। जगह-जगह पर स्पेशल लाइट्स और मूर्तियों के जरिए खूबसूरत नजारे बनाए गए हैं। गाय के थन से दूध पीते नन्हे कान्हा, विशाल वृक्ष से लटकता अजगर, अपनी गुहा में बैठा शेर, वनवास के दौरान हनुमान से भेंट करते राम-लक्ष्मण, इन्हीं नजारों में से हैं। मुझे सबसे ज्यादा मोहित किया अर्धनारेश्वर की प्रतिमा ने। स्त्री-पुरुष के यह संगम रोमांचित कर देने वाला था। जितना आगे बढ़ते गए, रास्ता संकरा होता चला गया। एक जगह जब घुटनों के बल आगे बढऩे की नौबत आई, तो अहसास हुआ कि यह रास्ता शायद वैष्णोदेवी की गुफा से प्रेरित होकर बनाया गया है। और हुआ भी वही। थोड़ी सी कठिनाई के बाद जब अंदर पहुंचे तो मां वैष्णोदेवी विराजमान थीं। उनके दर्शन करके हृदय प्रफुल्लित हो गया। वहां से फिर बाहर निकले तो लगा कि सभी देवी-देवताओं का आशिर्वाद लेकर बाहर आए हैं। उसके बाद हमने काफिला आगे बढ़ाया, अगले पड़ाव की ओर।
साईंधाम का नाम सुनकर तो समझ में आ गया था कि हम साईंबाबा के दरबार में पेश होने जा रहे हैं, लेकिन तब तक भी अंदाजा नहीं था कि मुझे केसा अनुभव होने वाला है। जैसे ही साईंधाम में प्रवेश किया, तो सहसा शिर्डी की याद जेहन में ताजा हो गई। हूबहू वैसा ही माहौल। मन सुखद आश्चर्य से भर उठा। काफी वक्त से इच्छा होने के बावजूद शिर्डी नहीं जा पा रही थी। लगा कि शायद बाबा ने मेरी ही परेशानी हल करने के लिए मुझे साईंधाम बुलाया है। अचानक ही अहसास हुआ कि उस दिन गुरुवार था, तिस पर दशहरा। बाबा के दरबार में पेश होने का इससे पावन मौका और कुछ नहीं हो सकता था। मन का विश्वास पक्का हो गया कि जब बाबा को अपने भक्तों से मिलना होता है तो इसकी व्यवस्था वे स्वयं कर देते हैं। उस दिन सुबह तक भी मुझे अहसास नहीं था कि मुझे बाबा के दर्शन इस प्रकार होंगे।
खैर, इस अविस्मरणीय अनुभव के बाद हम वापस घर की ओर लौट चले। रावण दहन का समय नजदीक आ जाने की वजह से भीड़ बढ़ चली थी। इस शहर का यह अनोखा रूप देखकर ही मेरी इससे दोस्ती हो गई। हां, इस दोस्ती का श्रेय, ठग्गु की बदनाम कुल्फी, हनुमान वाले की चाट और वहां की स्पेशल चाय को भी जाता है, जिनका स्वाद अब तलक ताजा है। अपनी दोस्ती गहरी करने के लिए मुझे एक बार फिर इस शहर में जाना होगा। ताकि मैं सीता रसोई, ब्रह्मा की उत्पत्ति का स्थान आदि भी देख सकूं।
प्रांत: उत्तरप्रदेश
खासियत: शौकीनों का शहर
कानपुर से यूं तो मेरा वास्ता कई साल पहले से था। मौसा जी के स्थानांतरण के बाद मौसी लोग वहां काफी साल रहे। उनके पास ब्रेक जर्नी के दौरान जाना होता था। फिर एक मौसी की लड़की की शादी भी कानपुर में हुई। उस वक्त भी वहां जाना हुआ। सो कानपुर की जमीं पर कदम तो कई बार पड़े, लेकिन उस शहर को करीब से जानने का मौका एक भी बार नहीं मिल पाया। पर पिछले दिनों दशहरे का दिन कानपुर में बिताने को मिला और मेरी उस शहर से दोस्ती हो गई।
दुर्गा पूजा के लिए लखनऊ तक पहुंची थी। सो रिश्तेदारों से मिलने कानपुर जाना भी तय हुआ। दशहरे वाले दिन अल सुबह मैं और मां निकल पड़े कानपुर के लिए। सुबह की ठंडी हवाएं जैसे हमारे स्वागत को आतुर थीं। वहां जाकर पहली बार पता चला कि कानपुर सिर्फ खाने-पीने के लिए ही नहीं बल्कि और भी कई चीजों के लिए मशहूर है, जिनमें से सबसे खास रही हमारी बिठुर यात्रा।
दोपहर को हम लोग खाना खाने के बाद निकल पड़े कानपुर दर्शन के लिए। कुछ वक्त बाद ऐसा लगा जैसे शहर की भीड़-भाड़ से दूर गांव के शुद्ध वातावरण में कदम रख दिया हो। पता चला बिठुर आ गया है। सबसे पहले उडिय़ा समुदाय द्वारा बनवाया गया श्री जगन्नाथ जी का मंदिर देखा। मंदिर बेहद ही खूबसूरत और पूरी श्रद्धा से बनवाया गया है। तब जाकर महसूस हुआ कि अगर भक्त चाहे तो भगवान को वहीं बुला सकता है, जहां वह खुद है। यहां से आगे बढ़े, तो अगला पड़ाव रहा सुधांशु जी महाराज द्वारा आश्रम जिसे सिद्धधाम आश्रम के नाम से भी जाना जाता है। यहां का माहौल ही कुछ अलग था। इस जगह को दर्शनीय, वंदनीय और रमणीय होने की संज्ञा एक साथ दी जा सकती है। भीतर सबसे पहले दिखा विशाल मंदिर जहां, राधा-कृष्ण को मुख्य स्थान दिया गया है। मंदिर के बाईं ओर एक पहाड़ की आकृति दिखाई दी, जिसपर शिव-पार्वती अपने पुत्र गणेश सहित विराजमान थे। यह दृश्य हिमालय का है। इस पहाड़ के अंदर से भीतर जाने का रास्ता था। जगह-जगह पर स्पेशल लाइट्स और मूर्तियों के जरिए खूबसूरत नजारे बनाए गए हैं। गाय के थन से दूध पीते नन्हे कान्हा, विशाल वृक्ष से लटकता अजगर, अपनी गुहा में बैठा शेर, वनवास के दौरान हनुमान से भेंट करते राम-लक्ष्मण, इन्हीं नजारों में से हैं। मुझे सबसे ज्यादा मोहित किया अर्धनारेश्वर की प्रतिमा ने। स्त्री-पुरुष के यह संगम रोमांचित कर देने वाला था। जितना आगे बढ़ते गए, रास्ता संकरा होता चला गया। एक जगह जब घुटनों के बल आगे बढऩे की नौबत आई, तो अहसास हुआ कि यह रास्ता शायद वैष्णोदेवी की गुफा से प्रेरित होकर बनाया गया है। और हुआ भी वही। थोड़ी सी कठिनाई के बाद जब अंदर पहुंचे तो मां वैष्णोदेवी विराजमान थीं। उनके दर्शन करके हृदय प्रफुल्लित हो गया। वहां से फिर बाहर निकले तो लगा कि सभी देवी-देवताओं का आशिर्वाद लेकर बाहर आए हैं। उसके बाद हमने काफिला आगे बढ़ाया, अगले पड़ाव की ओर।
साईंधाम का नाम सुनकर तो समझ में आ गया था कि हम साईंबाबा के दरबार में पेश होने जा रहे हैं, लेकिन तब तक भी अंदाजा नहीं था कि मुझे केसा अनुभव होने वाला है। जैसे ही साईंधाम में प्रवेश किया, तो सहसा शिर्डी की याद जेहन में ताजा हो गई। हूबहू वैसा ही माहौल। मन सुखद आश्चर्य से भर उठा। काफी वक्त से इच्छा होने के बावजूद शिर्डी नहीं जा पा रही थी। लगा कि शायद बाबा ने मेरी ही परेशानी हल करने के लिए मुझे साईंधाम बुलाया है। अचानक ही अहसास हुआ कि उस दिन गुरुवार था, तिस पर दशहरा। बाबा के दरबार में पेश होने का इससे पावन मौका और कुछ नहीं हो सकता था। मन का विश्वास पक्का हो गया कि जब बाबा को अपने भक्तों से मिलना होता है तो इसकी व्यवस्था वे स्वयं कर देते हैं। उस दिन सुबह तक भी मुझे अहसास नहीं था कि मुझे बाबा के दर्शन इस प्रकार होंगे।
खैर, इस अविस्मरणीय अनुभव के बाद हम वापस घर की ओर लौट चले। रावण दहन का समय नजदीक आ जाने की वजह से भीड़ बढ़ चली थी। इस शहर का यह अनोखा रूप देखकर ही मेरी इससे दोस्ती हो गई। हां, इस दोस्ती का श्रेय, ठग्गु की बदनाम कुल्फी, हनुमान वाले की चाट और वहां की स्पेशल चाय को भी जाता है, जिनका स्वाद अब तलक ताजा है। अपनी दोस्ती गहरी करने के लिए मुझे एक बार फिर इस शहर में जाना होगा। ताकि मैं सीता रसोई, ब्रह्मा की उत्पत्ति का स्थान आदि भी देख सकूं।
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