Saturday, July 2, 2011

उदासी के बादल, उम्मीद की बारिश


 
पिछले कुछ दिनों से हो रही बारिश की वजह से सड़क के गड्ढों में भले ही पानी भर गया हो, कीचड़ की चिप-चिप से भी हम परेशान हों, लेकिन क्या कभी आपने बारिश के बाद आकाश और प्रकृति की ओर निहारा है? सबकुछ कितना साफ, धुला-धुला-सा लगता है ना।

गर्मी, प्रदूषण, उमस और धूल से बेहाल पेड़-पौधे बारिश के छींटे पड़ते ही ताजे हो जाते हैं। सब नहाए, खुशगवार-से हवाओं के साथ डोलते रहते हैं। रंगों के चेहरे और साफ हो जाते हैं। हरा रंग और गाढ़ा और जाता है, नीला रंग और गहरा।

एक अच्छी-सी बारिश के बाद आकाश भी कितना साफ नजर आता है। पूरी तरह निरभ्र और खाली। उसके बाद खिलता है इंद्रधनुष, जो कि बारिश का सतरंगी फूल है। इस छोर से उस छोर तक आकाश में अटका हुआ।

क्या बारिश और आंसुओं का आपस में कुछ नाता है? क्या उनमें किसी तरह की कोई समानता है? जब मन में अवसाद और दुख की धूल चढ़ जाती है और उस पर गहरा नैराश्य छा जाता है तो आंखों से होने वाली बारिश इन सबको उसी तरह साफ कर देती है, जैसे आकाश की बारिश धरती को।

और उस धुले मन में भी एक इंद्रधनुष-सा खिंच जाता है, जो भले ही किसी को दिखाई न दे, लेकिन भीतर जरूर महसूस किया जा सकता है। इंद्रधनुष के इस झरोखे से देखें तो रंग और रोशनियां और दिलकश नजर आते हैं: धुले-धुले, निथरे-निथरे। जिंदगी जरा आसान मालूम होती है। सिमटकर रह जाती है दुख की सल्तनत।

अक्सर कहा जाता है कि रोना कमजोरी की निशानी है। जो लोग मजबूत और दृढ़ होते हैं, उन्हें रोना शोभा नहीं देता। लेकिन कभी-कभी रोना बहुत जरूरी हो जाता है। आंखों से होने वाली बारिश के बाद मन के स्वच्छ आकाश में उम्मीद की किरण दोबारा दिखाई देने लगती है।

अवसाद की धूल छंटते ही आगे का रास्ता साफ हो जाता है। अनिश्चितता के बादल जैसे ही आंसुओं के रूप में बरस जाते हैं, उसके बाद मन एक बार फिर दृढ़ हो आगे बढ़ने को तैयार होता है। इसलिए मन में विषाद के बादलों के जमा हो जाने पर आंखों से होने वाली बारिश को रोकना मुमकिन नहीं होता।

शायद यह मुनासिब भी नहीं है। जब हम आंसुओं को पी जाते हैं, तो मन कितना भारी-सा लगता है। आखिर कौन-सा आकाश घने गहरे बादलों को अपने भीतर जज्ब कर जाना चाहेगा?

पहले मैं अक्सर आंसुओं को जज्ब कर जाती थी। किसी भी परिस्थिति में कमजोर पड़ना मुझे गवारा नहीं था। पर इस कोशिश में कई बार इस अजीब दर्द से भी गुजरी हूं मैं। तब भी मैं खुलकर नहीं रोई थी, जब मेरा सबसे बड़ा सहारा, मेरे पिता मुझे संघर्ष के लिए अकेला छोड़ गए थे।

मेरे जीवन का आधार स्तंभ हिल गया था, पर आंसू नहीं निकले। उसके बाद मंजिल की तलाश में जिंदगी के उबड़-खाबड़ रास्तों से गुजरते हुए जब एकदम थककर चूर हो गई तो एक दिन मैं रोई। टूटकर रोई, ऐसा लगा जैसे सालों से बंद मन के बांध के कपाट खुल गए हों।

जब आंसू थमे तो न केवल मन हल्का-सा महसूस हुआ, बल्कि अंधेरों के बीच कहीं रोशनी की किरण भी नजर आई। तब जाकर समझ में आया कि बारिश और आंसुओं का कुछ न कुछ नाता होता है और धुली हुई उदासी और उम्मीद की साफ रोशनी का भी।

यदि आंसुओं की इस बारिश की कोई जरूरत न होती तो शायद हमारी आंखों में पानी ही न होता।